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mahabharat 1.28.12: पुत्र के प्रति स्नेह के कारण विनता ने फिर कहा - बेटा, जो चीज तुम्हारे पेट में न पच सके, उसे ब्राह्मण समझो। ॥12॥   |   mahabharat अध्याय 1.28: गरुडका अमृतके लिये जाना और अपनी माताकी आज्ञाके अनुसार निषादोंका भक्षण करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 28: गरुडका अमृतके लिये जाना और अपनी माताकी आज्ञाके अनुसार निषादोंका भक्षण करना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  1.28.12 
प्रोवाच चैनं विनता पुत्रहार्दादिदं वच:।
जठरे न च जीर्येद् यस्तं जानीहि द्विजोत्तमम्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
पुत्र के प्रति स्नेह के कारण विनता ने फिर कहा - बेटा, जो चीज तुम्हारे पेट में न पच सके, उसे ब्राह्मण समझो। ॥12॥
 
Due to her affection towards her son, Vinata again said, "Son, whatever cannot be digested in your stomach, consider it to be a Brahmin." ॥12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)