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mahabharat 1.27.8: वह दिव्य वन हृदय को आनंद देने वाला था। गंधर्वों और अप्सराओं को वह बहुत प्रिय था। वहाँ सर्वत्र मदमस्त भौंरे भिनभिना रहे थे। अपनी मनोहर शोभा के कारण वह अत्यंत मनोरम प्रतीत हो रहा था।   |   mahabharat अध्याय 1.27: रामणीयक द्वीपके मनोरम वनका वर्णन तथा गरुडका दास्यभावसे छूटनेके लिये सर्पोंसे उपाय पूछना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 27: रामणीयक द्वीपके मनोरम वनका वर्णन तथा गरुडका दास्यभावसे छूटनेके लिये सर्पोंसे उपाय पूछना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  1.27.8 
मन:संहर्षजं दिव्यं गन्धर्वाप्सरसां प्रियम्।
मत्तभ्रमरसंघुष्टं मनोज्ञाकृतिदर्शनम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
वह दिव्य वन हृदय को आनंद देने वाला था। गंधर्वों और अप्सराओं को वह बहुत प्रिय था। वहाँ सर्वत्र मदमस्त भौंरे भिनभिना रहे थे। अपनी मनोहर शोभा के कारण वह अत्यंत मनोरम प्रतीत हो रहा था।
 
That divine forest was a source of joy for the heart. Gandharvas and Apsaras loved it very much. Intoxicated bumblebees were buzzing everywhere there. It appeared extremely spectacular due to its beautiful splendor. 8.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)