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mahabharat 1.27.7: वायु के झोंके से अन्य वृक्षों से भी पुष्प झड़ रहे थे, मानो वहाँ के वृक्ष समूह वहाँ उपस्थित सर्पों पर पुष्प वर्षा कर रहे हों और उन्हें आहुति दे रहे हों।   |   mahabharat अध्याय 1.27: रामणीयक द्वीपके मनोरम वनका वर्णन तथा गरुडका दास्यभावसे छूटनेके लिये सर्पोंसे उपाय पूछना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 27: रामणीयक द्वीपके मनोरम वनका वर्णन तथा गरुडका दास्यभावसे छूटनेके लिये सर्पोंसे उपाय पूछना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  1.27.7 
वायुविक्षिप्तकुसुमैस्तथान्यैरपि पादपै:।
किरद्भिरिव तत्रस्थान् नागान् पुष्पाम्बुवृष्टिभि:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
वायु के झोंके से अन्य वृक्षों से भी पुष्प झड़ रहे थे, मानो वहाँ के वृक्ष समूह वहाँ उपस्थित सर्पों पर पुष्प वर्षा कर रहे हों और उन्हें आहुति दे रहे हों।
 
Due to the gust of wind, flowers from other trees were also falling, as if the groups of trees there were showering flowers on the serpents present there and offering oblations to them. 7.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)