श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 27: रामणीयक द्वीपके मनोरम वनका वर्णन तथा गरुडका दास्यभावसे छूटनेके लिये सर्पोंसे उपाय पूछना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  1.27.6 
उत्पतद्भिरिवाकाशं वृक्षैर्मलयजैरपि।
शोभितं पुष्पवर्षाणि मुञ्चद्भिर्मारुतोद्धतै:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
वहाँ ऊँचे-ऊँचे मलाज वृक्ष ऐसे लग रहे थे मानो आकाश में उड़ रहे हों। वे हवा के वेग से झूम रहे थे और पुष्प वर्षा कर उस क्षेत्र की शोभा बढ़ा रहे थे।
 
There, the tall Malaja trees appeared as if they were flying in the sky. They were swaying in the force of the wind and showering flowers, enhancing the beauty of that region.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)