श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 27: रामणीयक द्वीपके मनोरम वनका वर्णन तथा गरुडका दास्यभावसे छूटनेके लिये सर्पोंसे उपाय पूछना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  1.27.16 
सौतिरुवाच
श्रुत्वा तमब्रुवन् सर्पा आहरामृतमोजसा।
ततो दास्याद् विप्रमोक्षो भविता तव खेचर॥ १६॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं- गरुड़ की बात सुनकर सर्पों ने कहा- 'गरुड़! अपना पराक्रम दिखाकर हमारे लिए अमृत ले आओ। इससे तुम दासत्व के बंधन से मुक्त हो जाओगे।'॥16॥
 
Ugrashravaji says- After listening to Garuda, the snakes said- 'Garuda! Show your bravery and bring us nectar. This will free you from the bondage of slavery.'॥ 16॥
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्णे सप्तविंशोऽध्याय:॥ २७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें गरुडचरित्रविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २७॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)