श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 27: रामणीयक द्वीपके मनोरम वनका वर्णन तथा गरुडका दास्यभावसे छूटनेके लिये सर्पोंसे उपाय पूछना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  1.27.15 
किमाहृत्य विदित्वा वा किं वा कृत्वेह पौरुषम्।
दास्याद् वो विप्रमुच्येयं तथ्यं वदत लेलिहा:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
हे जीभ चाटने वाले सर्पो! सच-सच बताओ, मैं तुम्हारे लिए क्या लाऊँ? तुम्हें कौन-सा ज्ञान दूँ या यहाँ कौन-सा पुरुषार्थ दिखाऊँ, जिससे मैं और मेरी माता तुम्हारी दासता से मुक्त हो जाएँ॥15॥
 
‘You tongue-licking serpents! Tell me the truth, what should I bring for you? What knowledge should I give you or what effort should I show you here, so that I and my mother can be freed from your slavery.’॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)