किमाहृत्य विदित्वा वा किं वा कृत्वेह पौरुषम्।
दास्याद् वो विप्रमुच्येयं तथ्यं वदत लेलिहा:॥ १५॥
अनुवाद
हे जीभ चाटने वाले सर्पो! सच-सच बताओ, मैं तुम्हारे लिए क्या लाऊँ? तुम्हें कौन-सा ज्ञान दूँ या यहाँ कौन-सा पुरुषार्थ दिखाऊँ, जिससे मैं और मेरी माता तुम्हारी दासता से मुक्त हो जाएँ॥15॥
‘You tongue-licking serpents! Tell me the truth, what should I bring for you? What knowledge should I give you or what effort should I show you here, so that I and my mother can be freed from your slavery.’॥ 15॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥