श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 27: रामणीयक द्वीपके मनोरम वनका वर्णन तथा गरुडका दास्यभावसे छूटनेके लिये सर्पोंसे उपाय पूछना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  1.27.14 
तस्मिंस्तु कथिते मात्रा कारणे गगनेचर:।
उवाच वचनं सर्पांस्तेन दु:खेन दु:खित:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
जब माता ने यह कारण बताया, तब आकाशगामी गरुड़ ने दुःख से दुःखी होकर सर्पों से कहा-॥14॥
 
When the mother told this reason, the sky-faring Garuda, saddened by the sorrow, said to the snakes -॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)