श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 27: रामणीयक द्वीपके मनोरम वनका वर्णन तथा गरुडका दास्यभावसे छूटनेके लिये सर्पोंसे उपाय पूछना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.27.10 
तत् ते वनं समासाद्य विजह्रु: पन्नगास्तदा।
अब्रुवंश्च महावीर्यं सुपर्णं पतगेश्वरम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
उस वन में पहुँचकर वे सर्प सब दिशाओं में विचरण करने लगे और महाबली पक्षीराज गरुड़ से इस प्रकार बोले ॥10॥
 
Having reached that forest the serpents began roaming in all directions and spoke to the mighty bird king Garuda in this manner:॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)