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mahabharat 1.25.8: 'हजार नेत्रों वाले नमुचिनाशन! शचीपते! आपको नमस्कार है। आप सूर्य के ताप से पीड़ित सर्पों को जल से स्नान कराकर नौका के समान उनके रक्षक बनिए। 8॥   |   mahabharat अध्याय 1.25: सूर्यके तापसे मूर् च् छत हुए सर्पोंकी रक्षाके लिये कद्रूद्वारा इन्द्रदेवकी स्तुति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 25: सूर्यके तापसे मूर् च् छत हुए सर्पोंकी रक्षाके लिये कद्रूद्वारा इन्द्रदेवकी स्तुति  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  1.25.8 
नमुचिघ्न नमस्तेऽस्तु सहस्राक्ष शचीपते।
सर्पाणां सूर्यतप्तानां वारिणा त्वं प्लवो भव॥ ८॥
 
 
अनुवाद
'हजार नेत्रों वाले नमुचिनाशन! शचीपते! आपको नमस्कार है। आप सूर्य के ताप से पीड़ित सर्पों को जल से स्नान कराकर नौका के समान उनके रक्षक बनिए। 8॥
 
‘Namuchinashan with a thousand eyes! Shchipate! Greetings to you. You, by bathing the snakes suffering from the heat of the sun with water, become their protector like a boat. 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)