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mahabharat 1.25.4: 'कल्याणी विनती करती है! समुद्र के भीतर निर्जन प्रदेश में सर्पों का एक अत्यंत सुंदर एवं परम मनोहर निवास है। मुझे वहाँ ले चलो।'   |   mahabharat अध्याय 1.25: सूर्यके तापसे मूर् च् छत हुए सर्पोंकी रक्षाके लिये कद्रूद्वारा इन्द्रदेवकी स्तुति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 25: सूर्यके तापसे मूर् च् छत हुए सर्पोंकी रक्षाके लिये कद्रूद्वारा इन्द्रदेवकी स्तुति  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.25.4 
नागानामालयं भद्रे सुरम्यं चारुदर्शनम्।
समुद्रकुक्षावेकान्ते तत्र मां विनते नय॥ ४॥
 
 
अनुवाद
'कल्याणी विनती करती है! समुद्र के भीतर निर्जन प्रदेश में सर्पों का एक अत्यंत सुंदर एवं परम मनोहर निवास है। मुझे वहाँ ले चलो।'
 
'Kalyani requests! In the deserted region inside the ocean, there is a very beautiful and extremely beautiful abode of snakes. Take me there.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)