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mahabharat 1.25.14: 'मुहूर्त भी आप ही हैं, तिथि भी आप ही हैं, तरंग भी आप ही हैं और क्षण भी आप ही हैं। शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष भी आपसे भिन्न नहीं हैं। काल, कष्ट और त्रुटी, ये सब आपके ही स्वरूप हैं। संवत्सर, ऋतु, मास, रात्रि और दिन भी आप ही हैं।॥14॥   |   mahabharat अध्याय 1.25: सूर्यके तापसे मूर् च् छत हुए सर्पोंकी रक्षाके लिये कद्रूद्वारा इन्द्रदेवकी स्तुति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 25: सूर्यके तापसे मूर् च् छत हुए सर्पोंकी रक्षाके लिये कद्रूद्वारा इन्द्रदेवकी स्तुति  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  1.25.14 
त्वं मुहूर्तस्तिथिस्त्वं च त्वं लवस्त्वं पुन: क्षण:।
शुक्लस्त्वं बहुलस्त्वं च कला काष्ठा त्रुटिस्तथा।
संवत्सरर्तवो मासा रजन्यश्च दिनानि च॥ १४॥
 
 
अनुवाद
'मुहूर्त भी आप ही हैं, तिथि भी आप ही हैं, तरंग भी आप ही हैं और क्षण भी आप ही हैं। शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष भी आपसे भिन्न नहीं हैं। काल, कष्ट और त्रुटी, ये सब आपके ही स्वरूप हैं। संवत्सर, ऋतु, मास, रात्रि और दिन भी आप ही हैं।॥14॥
 
'You are the Muhurta, you are the date, you are the wave and you are the moment. The Shukla paksha and the Krishna paksha are also not different from you. Kala, Kashta and Truti are all your forms. You are the Samvatsara, season, month, night and day.॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)