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mahabharat 1.25.1: उग्रश्रवाजी कहते हैं - शौनकादि महर्षि! तत्पश्चात् महाबली और पराक्रमी गरुड़ अपनी इच्छानुसार विचरण करते हुए समुद्र के उस पार अपनी माता के पास आये॥1॥   |   mahabharat अध्याय 1.25: सूर्यके तापसे मूर् च् छत हुए सर्पोंकी रक्षाके लिये कद्रूद्वारा इन्द्रदेवकी स्तुति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 25: सूर्यके तापसे मूर् च् छत हुए सर्पोंकी रक्षाके लिये कद्रूद्वारा इन्द्रदेवकी स्तुति  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  1.25.1 
सौतिरुवाच
तत: कामगम: पक्षी महावीर्यो महाबल:।
मातुरन्तिकमागच्छत् परं पारं महोदधे:॥ १॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं - शौनकादि महर्षि! तत्पश्चात् महाबली और पराक्रमी गरुड़ अपनी इच्छानुसार विचरण करते हुए समुद्र के उस पार अपनी माता के पास आये॥1॥
 
Ugrashravaji says – Shaunkadi Maharishi! Thereafter, the mighty and mighty Garuda, who moved as per his wish, came to his mother on the other side of the ocean. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)