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mahabharat 1.233.17: 'वीर! तुम दोनों पुरुष रत्नों ने मुझे प्रसन्नतापूर्वक संतुष्ट किया है। अब मैं तुम्हें जहाँ चाहो वहाँ जाने की अनुमति देता हूँ।'॥17॥   |   mahabharat अध्याय 1.233: इन्द्रदेवका श्रीकृष्ण और अर्जुनको वरदान तथा श्रीकृष्ण, अर्जुन और मयासुरका अग्निसे विदा लेकर एक साथ यमुनातटपर बैठना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 233: इन्द्रदेवका श्रीकृष्ण और अर्जुनको वरदान तथा श्रीकृष्ण, अर्जुन और मयासुरका अग्निसे विदा लेकर एक साथ यमुनातटपर बैठना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.233.17 
युवाभ्यां पुरुषाग्रॺाभ्यां तर्पितोऽस्मि यथासुखम्।
अनुजानामि वां वीरौ चरतं यत्र वाञ्छितम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
'वीर! तुम दोनों पुरुष रत्नों ने मुझे प्रसन्नतापूर्वक संतुष्ट किया है। अब मैं तुम्हें जहाँ चाहो वहाँ जाने की अनुमति देता हूँ।'॥17॥
 
'Hero! You two gems of a man have happily satisfied me. Now I give you permission to go wherever you wish.'॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)