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श्लोक 1.232.32  |
वैशम्पायन उवाच
ततस्ते सर्व एवैनं पुत्रा: सम्यगुपासते।
स च तानात्मजान् सर्वानाश्वासयितुमुद्यत:॥ ३२॥ |
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| अनुवाद |
| वैशम्पायन कहते हैं: तत्पश्चात सभी पुत्र अपने पिता के पास आकर यथायोग्य ढंग से बैठ गये और ऋषि भी सभी पुत्रों को आश्वासन देने के लिए तत्पर हो गये। |
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| Vaishmpayana says: Thereafter all the sons came and sat beside their father in the proper manner and the sage too was ready to give assurance to all the sons. |
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इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि मयदर्शनपर्वणि शार्ङ्गकोपाख्याने द्वात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २३२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत मयदर्शनपर्वमें शार्ङ्गकोपाख्यानविषयक दो सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २३२॥
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