| श्री महाभारत » पर्व 1: आदि पर्व » अध्याय 232: मन्दपालका अपने बाल-बच्चोंसे मिलना » श्लोक 2 |
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| | | | श्लोक 1.232.2  | स तप्यमान: पुत्रार्थे लपितामिदमब्रवीत्।
कथं नु शक्ता: शरणे लपिते मम पुत्रका:॥ २॥ | | | | | | अनुवाद | | अपने पुत्रों के लिए व्याकुल होकर उसने लपिता से कहा, 'लपिता! मेरे बच्चे अपने घोंसले में कैसे जीवित रह सकेंगे?॥ 2॥ | | | | Being distressed for his sons, he said to Lapita, 'Lapitta! How will my children be able to survive in their nest?॥ 2॥ | | ✨ ai-generated | | |
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