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श्लोक 1.232.14  |
मन्दपाल उवाच
नाहमेवं चरे लोके यथा त्वमभिमन्यसे।
अपत्यहेतोर्विचरे तच्च कृच्छ्रगतं मम॥ १४॥ |
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| अनुवाद |
| मंडपाल बोला - अरे ! मैं इस संसार में उस प्रकार नहीं घूमता जैसा तुम सोचते हो । मैं तो केवल अपने बच्चों के लिए घूमता हूँ । मेरे वे बच्चे संकट में हैं ॥ 14॥ |
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| Mandpal said - Oh! I do not roam in this world in the way you think. I roam only for my children. Those children of mine are in trouble.॥ 14॥ |
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