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श्लोक 1.232.13  |
गच्छ त्वं जरितामेव यदर्थं परितप्यसे।
चरिष्याम्यहमप्येका यथा कुपुरुषाश्रिता॥ १३॥ |
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| अनुवाद |
| ‘अतः अब तुम उस स्त्री के पास जाओ जिसके लिए तुम इतने व्याकुल हो। मैं भी दुष्ट पुरुष के आश्रय में रहने वाली स्त्री की भाँति अकेला ही विचरण करूँगा।’॥13॥ |
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| ‘So now you go to that woman for whom you are so upset. I too will wander alone like a woman who is under the protection of an evil man.’॥ 13॥ |
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