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श्लोक 1.232.11  |
तामेव तु ममामित्रां चिन्तयन् परितप्यसे।
ध्रुवं मयि न ते स्नेहो यथा तस्यां पुराभवत्॥ ११॥ |
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| अनुवाद |
| "तुम मेरी शत्रु, मेरी सहधर्मिणी के विषय में चिन्ता करते हुए व्याकुल हो रहे हो। निश्चय ही तुम मुझ पर वैसा स्नेह नहीं रखते जैसा मेरी पहली पत्नी पर रखते थे॥ 11॥ |
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| "You are getting upset worrying about my enemy, my co-wife. You certainly don't have the same affection for me as you had for my first wife.॥ 11॥ |
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