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mahabharat 1.231.6: वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन! इस प्रकार आपस में बातें करके वे मण्डपालपुत्र एकाग्रचित्त होकर अग्निदेव की स्तुति करने लगे; उस स्तुति को सुनो॥6॥   |   mahabharat अध्याय 1.231: शार्ङ्गकोंके स्तवनसे प्रसन्न होकर अग्निदेवका उन्हें अभय देना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 231: शार्ङ्गकोंके स्तवनसे प्रसन्न होकर अग्निदेवका उन्हें अभय देना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  1.231.6 
वैशम्पायन उवाच
एवं सम्भाष्य तेऽन्योन्यं मन्दपालस्य पुत्रका:।
तुष्टुवु: प्रयता भूत्वा यथाग्निं शृणु पार्थिव॥ ६॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन! इस प्रकार आपस में बातें करके वे मण्डपालपुत्र एकाग्रचित्त होकर अग्निदेव की स्तुति करने लगे; उस स्तुति को सुनो॥6॥
 
Vaishampayanji says- Rajan! After talking among themselves in this way, those sons of Mandapal became concentrated and started praising Agnidev; Listen to that praise. 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)