श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 231: शार्ङ्गकोंके स्तवनसे प्रसन्न होकर अग्निदेवका उन्हें अभय देना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  1.231.20 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तो जातवेदा द्रोणेन ब्रह्मवादिना।
द्रोणमाह प्रतीतात्मा मन्दपालप्रतिज्ञया॥ २०॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! अग्निदेव ब्राह्मण द्रोण की प्रार्थना सुनकर प्रसन्न हुए और मण्डपाल को दी हुई अपनी प्रतिज्ञा को स्मरण करके द्रोण से बोले॥20॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Agni was pleased at being prayed to by Drona, a Brahmin, remembering the promise he had made to Mandapala and said to Drona. 20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)