श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 231: शार्ङ्गकोंके स्तवनसे प्रसन्न होकर अग्निदेवका उन्हें अभय देना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.231.2 
यस्तु कृच्छ्रमनुप्राप्तं विचेता नावबुध्यते।
स कृच्छ्रकाले व्यथितो न श्रेयो विन्दते महत्॥ २॥
 
 
अनुवाद
जो मूर्ख मनुष्य आने वाले संकट से अनभिज्ञ रहता है, वह संकट के समय व्यथित होने के कारण महान कल्याण से वंचित रहता है ॥2॥
 
A foolish person who is unaware of the impending danger is deprived of great welfare due to being distressed at the time of danger. ॥2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)