श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 231: शार्ङ्गकोंके स्तवनसे प्रसन्न होकर अग्निदेवका उन्हें अभय देना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  1.231.16 
सूर्यो भूत्वा रश्मिभिर्जातवेदो
भूमेरम्भो भूमिजातान् रसांश्च।
विश्वानादाय पुनरुत्सृज्य काले
दृष्ट्वा वृष्टॺा भावयसीह शुक्र॥ १६॥
 
 
अनुवाद
हे श्वेतवर्ण वाले सर्वज्ञ अग्निदेव! आप स्वयं सूर्य बनकर अपनी किरणों द्वारा पृथ्वी से जल आदि समस्त भूत-तत्त्वों को ग्रहण करते हैं और जब समय आता है और आपको आवश्यकता होती है, तब आप उन समस्त भूत-तत्त्वों को वर्षा के द्वारा जल के रूप में पृथ्वी पर उपस्थित करते हैं। ॥16॥
 
O all-knowing Agnidev (God of fire) of white colour, you yourself become the Sun and absorb water and all the earthly essences from the Earth through your rays. And when the time comes and you feel the need, you present all those essences to the Earth in the form of water through rain. ॥16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)