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mahabharat 1.231.14: हव्यवाह! आप ही इन तीनों लोकों की रचना करते हैं और जब प्रलय का समय आता है, तब पुनः प्रकाशित होकर इन सबका संहार कर देते हैं। अतः हे अग्नि! आप ही सम्पूर्ण जगत् के मूल हैं और आप ही उसका प्रलय स्थान भी हैं॥14॥   |   mahabharat अध्याय 1.231: शार्ङ्गकोंके स्तवनसे प्रसन्न होकर अग्निदेवका उन्हें अभय देना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 231: शार्ङ्गकोंके स्तवनसे प्रसन्न होकर अग्निदेवका उन्हें अभय देना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  1.231.14 
सृष्ट्वा लोकांस्त्रीनिमान् हव्यवाह
काले प्राप्ते पचसि पुन: समिद्ध:।
त्वं सर्वस्य भुवनस्य प्रसूति-
स्त्वमेवाग्ने भवसि पुन: प्रतिष्ठा॥ १४॥
 
 
अनुवाद
हव्यवाह! आप ही इन तीनों लोकों की रचना करते हैं और जब प्रलय का समय आता है, तब पुनः प्रकाशित होकर इन सबका संहार कर देते हैं। अतः हे अग्नि! आप ही सम्पूर्ण जगत् के मूल हैं और आप ही उसका प्रलय स्थान भी हैं॥14॥
 
Havyavaha! You create these three worlds and then when the time of destruction comes, you light up again and destroy them all. Therefore, Agni! You are the origin of the entire universe and you are also its dissolution place.॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)