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mahabharat 1.23.14-15h: उनसे किसी प्रकार का भय न हो। मेरे साथ आओ और उनका दर्शन करो। अग्निदेव की यह बात सुनकर देवताओं और ऋषियों ने गरुड़ के पास जाकर इस प्रकार वचनों द्वारा उनकी स्तुति की (यहाँ गरुड़ की स्तुति परम पुरुष कहकर की गई है)। ॥14 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 1.23: पराजित विनताका कद्रूकी दासी होना, गरुडकी उत्पत्ति तथा देवताओंद्वारा उनकी स्तुति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 23: पराजित विनताका कद्रूकी दासी होना, गरुडकी उत्पत्ति तथा देवताओंद्वारा उनकी स्तुति  »  श्लोक 14-15h
 
 
श्लोक  1.23.14-15h 
न भी: कार्या कथं चात्र पश्यध्वं सहिता मम।
एवमुक्तास्तदा गत्वा गरुडं वाग्भिरस्तुवन्॥ १४॥
ते दूरादभ्युपेत्यैनं देवा: सर्षिगणास्तदा।
 
 
अनुवाद
उनसे किसी प्रकार का भय न हो। मेरे साथ आओ और उनका दर्शन करो। अग्निदेव की यह बात सुनकर देवताओं और ऋषियों ने गरुड़ के पास जाकर इस प्रकार वचनों द्वारा उनकी स्तुति की (यहाँ गरुड़ की स्तुति परम पुरुष कहकर की गई है)। ॥14 1/2॥
 
There should be no fear of them. Come with me and have a glimpse of them. On hearing Agnidev say this, the gods and sages went to Garuda and praised him with their words in this manner (here Garuda is praised as the Supreme Being). ॥14 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)