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mahabharat 1.23.1-2: उग्रश्रवाजी कहते हैं - शौनक! तत्पश्चात वेगवान कद्रू विनता के साथ समुद्र पार करके तुरन्त ही उच्चैःश्रवा नामक घोड़े के पास पहुँची। उस समय उन दोनों ने उस महान् एवं वेगवान घोड़े को देखा, जिसकी पूँछ काली और रंग चन्द्रमा की किरणों के समान श्वेत था।   |   mahabharat अध्याय 1.23: पराजित विनताका कद्रूकी दासी होना, गरुडकी उत्पत्ति तथा देवताओंद्वारा उनकी स्तुति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 23: पराजित विनताका कद्रूकी दासी होना, गरुडकी उत्पत्ति तथा देवताओंद्वारा उनकी स्तुति  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  1.23.1-2 
सौतिरुवाच
तं समुद्रमतिक्रम्य कद्रूर्विनतया सह।
न्यपतत् तुरगाभ्याशे नचिरादिव शीघ्रगा॥ १॥
ततस्ते तं हयश्रेष्ठं ददृशाते महाजवम्।
शशाङ्ककिरणप्रख्यं कालवालमुभे तदा॥ २॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं - शौनक! तत्पश्चात वेगवान कद्रू विनता के साथ समुद्र पार करके तुरन्त ही उच्चैःश्रवा नामक घोड़े के पास पहुँची। उस समय उन दोनों ने उस महान् एवं वेगवान घोड़े को देखा, जिसकी पूँछ काली और रंग चन्द्रमा की किरणों के समान श्वेत था।
 
Ugrasravaji says- Shaunak! Thereafter the swift-moving Kadru crossed the ocean along with Vinata and immediately reached the horse Uchchaihshrava. At that time both of them saw that great and swift horse with a black tail and white colour like the rays of the moon.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)