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mahabharat 1.229.11: हाय! मुझ पर बड़ी दुःखद विपत्ति आ पड़ी है। इन चारों बच्चों में से मैं किसे साथ लेकर इस अग्नि को पार करूँ? मैं अपना कार्य कैसे करूँ? ऐसा सोचकर जरिता बहुत व्याकुल हो गई; किन्तु उस समय उसे अपने पुत्रों को इस अग्नि से बचाने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था।   |   mahabharat अध्याय 1.229: जरिताका अपने बच्चोंकी रक्षाके लिये चिन्तित होकर विलाप करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 229: जरिताका अपने बच्चोंकी रक्षाके लिये चिन्तित होकर विलाप करना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  1.229.11 
कमुपादाय शक्येयं गन्तुं कष्टापदुत्तमा।
किं नु कृत्वा कृतं कार्यं भवेदिति च विह्वला।
नापश्यत् स्वधिया मोक्षं स्वसुतानां तदानलात्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
हाय! मुझ पर बड़ी दुःखद विपत्ति आ पड़ी है। इन चारों बच्चों में से मैं किसे साथ लेकर इस अग्नि को पार करूँ? मैं अपना कार्य कैसे करूँ? ऐसा सोचकर जरिता बहुत व्याकुल हो गई; किन्तु उस समय उसे अपने पुत्रों को इस अग्नि से बचाने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था।
 
Alas! A very painful calamity has befallen me. Which of these four children will I take with me to cross this fire? What can I do to accomplish my task? Thinking in this manner, Jarita became very upset; but she could not think of any way to save her sons from this fire at that time.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)