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mahabharat 1.228.9: मण्डपाल ने कहा - हे देवताओं! ये लोक, जिन्हें मैंने अपनी तपस्या से प्राप्त किया है, क्यों बन्द हैं? (ये भोग के साधनों से रहित क्यों हैं?) मैंने वहाँ कौन-सा पुण्य कर्म नहीं किया है, जिसका फल मुझे इस रूप में मिला है॥9॥   |   mahabharat अध्याय 1.228: शार्ङ्गकोपाख्यान—मन्दपाल मुनिके द्वारा जरिता-शार्ङ्गिकासे पुत्रोंकी उत्पत्ति और उन्हें बचानेके लिये मुनिका अग्निदेवकी स्तुति करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 228: शार्ङ्गकोपाख्यान—मन्दपाल मुनिके द्वारा जरिता-शार्ङ्गिकासे पुत्रोंकी उत्पत्ति और उन्हें बचानेके लिये मुनिका अग्निदेवकी स्तुति करना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  1.228.9 
मन्दपाल उवाच
किमर्थमावृता लोका ममैते तपसार्जिता:।
किं मया न कृतं तत्र यस्यैतत् कर्मण: फलम्॥ ९॥
 
 
अनुवाद
मण्डपाल ने कहा - हे देवताओं! ये लोक, जिन्हें मैंने अपनी तपस्या से प्राप्त किया है, क्यों बन्द हैं? (ये भोग के साधनों से रहित क्यों हैं?) मैंने वहाँ कौन-सा पुण्य कर्म नहीं किया है, जिसका फल मुझे इस रूप में मिला है॥9॥
 
Mandpal said - O Gods! Why are these worlds, which I have attained by my penance, closed? (Why are they devoid of means of enjoyment?) What good deed have I not done there, for which I have received the reward in this form.॥ 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)