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mahabharat 1.228.31-32: वैशम्पायनजी कहते हैं - हे राजन! इस प्रकार मण्डपाल मुनि की स्तुति सुनकर अग्निदेव उन परम तेजस्वी मुनि पर अत्यन्त प्रसन्न हुए और प्रसन्न मन से उनसे बोले - 'मैं आपके इच्छित कार्यों में से कौन-सा कार्य सम्पन्न करूँ?'॥31-32॥   |   mahabharat अध्याय 1.228: शार्ङ्गकोपाख्यान—मन्दपाल मुनिके द्वारा जरिता-शार्ङ्गिकासे पुत्रोंकी उत्पत्ति और उन्हें बचानेके लिये मुनिका अग्निदेवकी स्तुति करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 228: शार्ङ्गकोपाख्यान—मन्दपाल मुनिके द्वारा जरिता-शार्ङ्गिकासे पुत्रोंकी उत्पत्ति और उन्हें बचानेके लिये मुनिका अग्निदेवकी स्तुति करना  »  श्लोक 31-32
 
 
श्लोक  1.228.31-32 
वैशम्पायन उवाच
एवं स्तुतस्तदा तेन मन्दपालेन पावक:॥ ३१॥
तुतोष तस्य नृपते मुनेरमिततेजस:।
उवाच चैनं प्रीतात्मा किमिष्टं करवाणि ते॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - हे राजन! इस प्रकार मण्डपाल मुनि की स्तुति सुनकर अग्निदेव उन परम तेजस्वी मुनि पर अत्यन्त प्रसन्न हुए और प्रसन्न मन से उनसे बोले - 'मैं आपके इच्छित कार्यों में से कौन-सा कार्य सम्पन्न करूँ?'॥31-32॥
 
Vaishmpayana says - O King! On hearing the praise of the sage Mandapala in this manner, Agnidev became very pleased with that immensely illustrious sage and said to him with a happy mind - 'Which of your desired tasks should I accomplish?'॥ 31-32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)