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mahabharat 1.228.30-31h: हवि और काव्य आपमें ही प्रतिष्ठित हैं। हे प्रभु! आप ही प्रज्वलित अग्नि, पालन करने वाली धाता और बुद्धि के स्वामी बृहस्पति हैं। आप ही अश्विनीकुमार, मित्र (सूर्य), चंद्रमा और वायु भी हैं।॥30 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 1.228: शार्ङ्गकोपाख्यान—मन्दपाल मुनिके द्वारा जरिता-शार्ङ्गिकासे पुत्रोंकी उत्पत्ति और उन्हें बचानेके लिये मुनिका अग्निदेवकी स्तुति करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 228: शार्ङ्गकोपाख्यान—मन्दपाल मुनिके द्वारा जरिता-शार्ङ्गिकासे पुत्रोंकी उत्पत्ति और उन्हें बचानेके लिये मुनिका अग्निदेवकी स्तुति करना  »  श्लोक 30-31h
 
 
श्लोक  1.228.30-31h 
त्वयि हव्यं च कव्यं च यथावत् सम्प्रतिष्ठितम्।
त्वमेव दहनो देव त्वं धाता त्वं बृहस्पति:॥ ३०॥
त्वमश्विनौ यमौ मित्र: सोमस्त्वमसि चानिल:।
 
 
अनुवाद
हवि और काव्य आपमें ही प्रतिष्ठित हैं। हे प्रभु! आप ही प्रज्वलित अग्नि, पालन करने वाली धाता और बुद्धि के स्वामी बृहस्पति हैं। आप ही अश्विनीकुमार, मित्र (सूर्य), चंद्रमा और वायु भी हैं।॥30 1/2॥
 
Havi and Kavya are established in you only. O lord! You are the burning fire, the sustaining Dhata and the lord of wisdom Brihaspati. You are the twin Ashwinikumar, friend (Sun), Moon and wind.॥ 30 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)