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mahabharat 1.227.41-43h: मय दानव राजाओं के शिल्पियों में श्रेष्ठ था। उसे पहचानकर भगवान वसुदेव उसे मारने के लिए अपना चक्र लेकर उठ खड़े हुए। मय ने देखा कि एक ओर चक्र उसे मारने के लिए उठा हुआ है और दूसरी ओर अग्निदेव उसे जलाकर भस्म कर देना चाहते हैं। तब वह अर्जुन की शरण में गया और बोला - 'अर्जुन! भागो, मुझे बचाओ, मुझे बचाओ।'   |   mahabharat अध्याय 1.227: देवताओंकी पराजय, खाण्डववनका विनाश और मयासुरकी रक्षा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 227: देवताओंकी पराजय, खाण्डववनका विनाश और मयासुरकी रक्षा  »  श्लोक 41-43h
 
 
श्लोक  1.227.41-43h 
विज्ञाय दानवेन्द्राणां मयं वै शिल्पिनां वरम्॥ ४१॥
जिघांसुर्वासुदेवस्तं चक्रमुद्यम्य धिष्ठित:।
स चक्रमुद्यतं दृष्ट्वा दिधक्षन्तं च पावकम्॥ ४२॥
अभिधावार्जुनेत्येवं मयस्त्राहीति चाब्रवीत्।
 
 
अनुवाद
मय दानव राजाओं के शिल्पियों में श्रेष्ठ था। उसे पहचानकर भगवान वसुदेव उसे मारने के लिए अपना चक्र लेकर उठ खड़े हुए। मय ने देखा कि एक ओर चक्र उसे मारने के लिए उठा हुआ है और दूसरी ओर अग्निदेव उसे जलाकर भस्म कर देना चाहते हैं। तब वह अर्जुन की शरण में गया और बोला - 'अर्जुन! भागो, मुझे बचाओ, मुझे बचाओ।'
 
Maya was the best among the craftsmen of the demon kings. Recognizing him, Lord Vasudeva stood up with his discus to kill him. Maya saw that on one side the discus was raised to kill him and on the other side the god of fire wanted to burn him to ashes. Then he went to Arjuna for refuge and said - 'Arjuna! Run, save me, save me.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)