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mahabharat 1.227.40-41h: वत्स के सारथि अग्निदेव ने मूर्ति का रूप धारण कर लिया और सिर पर जटाएँ धारण कर लीं और मेघ के समान गर्जना करते हुए उस राक्षस के नाश की याचना करने लगे॥40 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 1.227: देवताओंकी पराजय, खाण्डववनका विनाश और मयासुरकी रक्षा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 227: देवताओंकी पराजय, खाण्डववनका विनाश और मयासुरकी रक्षा  »  श्लोक 40-41h
 
 
श्लोक  1.227.40-41h 
तमग्नि: प्रार्थयामास दिधक्षुर्वातसारथि:॥ ४०॥
शरीरवाञ्जटी भूत्वा नदन्निव बलाहक:।
 
 
अनुवाद
वत्स के सारथि अग्निदेव ने मूर्ति का रूप धारण कर लिया और सिर पर जटाएँ धारण कर लीं और मेघ के समान गर्जना करते हुए उस राक्षस के नाश की याचना करने लगे॥40 1/2॥
 
Agnidev, the charioteer of Vatsa, took the form of a statue and wore matted hair on his head and started roaring like a cloud and started asking for the destruction of that demon. 40 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)