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mahabharat 1.227.30: वे सभी प्राणी प्राणहीन होकर मृत्यु के मारे हुए प्राणियों के समान अग्नि में गिर पड़े। चाहे वे वन के किनारे हों या दुर्गम स्थानों पर, उन्हें कहीं भी शांति नहीं मिली। 30।   |   mahabharat अध्याय 1.227: देवताओंकी पराजय, खाण्डववनका विनाश और मयासुरकी रक्षा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 227: देवताओंकी पराजय, खाण्डववनका विनाश और मयासुरकी रक्षा  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  1.227.30 
व्यसवस्तेऽपतन्नग्नौ साक्षात् कालहता इव।
न चालभन्त ते शर्म रोधस्सु विषमेषु च॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
वे सभी प्राणी प्राणहीन होकर मृत्यु के मारे हुए प्राणियों के समान अग्नि में गिर पड़े। चाहे वे वन के किनारे हों या दुर्गम स्थानों पर, उन्हें कहीं भी शांति नहीं मिली। 30।
 
All those beings became lifeless and fell into the fire like those who were killed by death. Whether they were on the edge of the forest or in inaccessible places, they did not find peace anywhere. 30.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)