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mahabharat 1.225.9: जल के जलाशय अग्नि से तपाये हुए काढ़े के समान उबल रहे थे। उनमें रहने वाले कछुए और मछलियाँ आदि सब ओर से निर्जीव दिखाई दे रहे थे॥9॥   |   mahabharat अध्याय 1.225: खाण्डववनमें जलते हुए प्राणियोंकी दुर्दशा और इन्द्रके द्वारा जल बरसाकर आग बुझानेकी चेष्टा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 225: खाण्डववनमें जलते हुए प्राणियोंकी दुर्दशा और इन्द्रके द्वारा जल बरसाकर आग बुझानेकी चेष्टा  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  1.225.9 
जलाशयेषु तप्तेषु क्वाथ्यमानेषु वह्निना।
गतसत्त्वा: स्म दृश्यन्ते कूर्ममत्स्या: समन्तत:॥ ९॥
 
 
अनुवाद
जल के जलाशय अग्नि से तपाये हुए काढ़े के समान उबल रहे थे। उनमें रहने वाले कछुए और मछलियाँ आदि सब ओर से निर्जीव दिखाई दे रहे थे॥9॥
 
The water reservoirs were boiling like a decoction heated by the fire. The turtles and fish etc. living in them appeared lifeless everywhere.॥ 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)