श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 225: खाण्डववनमें जलते हुए प्राणियोंकी दुर्दशा और इन्द्रके द्वारा जल बरसाकर आग बुझानेकी चेष्टा  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  1.225.7 
संदष्टदशनाश्चान्ये समुत्पेतुरनेकश:।
ततस्तेऽतीव घूर्णन्त: पुनरग्नौ प्रपेदिरे॥ ७॥
 
 
अनुवाद
कुछ पशु दाँत पीसते, बार-बार उछलते और बड़े-बड़े चक्कर लगाते हुए पुनः अग्नि में गिर पड़ते थे॥7॥
 
Some animals, gnashing their teeth, jumping up and down again and again, and whirling around in great circles, would again fall into the fire.॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)