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mahabharat 1.225.14: प्रज्वलित अग्नि की विशाल लपटें आकाश में उठने लगीं और देवताओं के हृदय में बड़ा भय उत्पन्न हो गया।   |   mahabharat अध्याय 1.225: खाण्डववनमें जलते हुए प्राणियोंकी दुर्दशा और इन्द्रके द्वारा जल बरसाकर आग बुझानेकी चेष्टा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 225: खाण्डववनमें जलते हुए प्राणियोंकी दुर्दशा और इन्द्रके द्वारा जल बरसाकर आग बुझानेकी चेष्टा  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  1.225.14 
वह्नेश्चापि प्रदीप्तस्य खमुत्पेतुर्महार्चिष:।
जनयामासुरुद्वेगं सुमहान्तं दिवौकसाम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
प्रज्वलित अग्नि की विशाल लपटें आकाश में उठने लगीं और देवताओं के हृदय में बड़ा भय उत्पन्न हो गया।
 
Huge flames of the blazing fire began to rise into the sky and cause great fear in the hearts of the gods.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)