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mahabharat 1.225.10: उस वन में जो प्राणियों के लिए वधशाला बन गया था, बहुत से प्राणी अपने जलते हुए शरीरों सहित अग्नि के समान प्रकट हो रहे थे॥10॥   |   mahabharat अध्याय 1.225: खाण्डववनमें जलते हुए प्राणियोंकी दुर्दशा और इन्द्रके द्वारा जल बरसाकर आग बुझानेकी चेष्टा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 225: खाण्डववनमें जलते हुए प्राणियोंकी दुर्दशा और इन्द्रके द्वारा जल बरसाकर आग बुझानेकी चेष्टा  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.225.10 
शरीरैरपरे दीप्तैर्देहवन्त इवाग्नय:।
अदृश्यन्त वने तत्र प्राणिन: प्राणिसंक्षये॥ १०॥
 
 
अनुवाद
उस वन में जो प्राणियों के लिए वधशाला बन गया था, बहुत से प्राणी अपने जलते हुए शरीरों सहित अग्नि के समान प्रकट हो रहे थे॥10॥
 
In that forest which had become a slaughter house for creatures, many creatures appeared like embodied fire with their burning bodies.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)