श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 224: अग्निदेवका अर्जुन और श्रीकृष्णको दिव्य धनुष, अक्षय तरकस, दिव्य रथ और चक्र आदि प्रदान करना तथा उन दोनोंकी सहायतासे खाण्डववनको जलाना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  1.224.37 
दह्यतस्तस्य च बभौ रूपं दावस्य भारत।
मेरोरिव नगेन्द्रस्य कीर्णस्यांशुमतोंऽशुभि:॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
भारत! उस जलते हुए खाण्डव वन की शोभा ऐसी प्रतीत हो रही थी, मानो पर्वतराज मेरु का सम्पूर्ण शरीर सूर्य की किरणों से प्रकाशित हो रहा हो।
 
Bhaarat! The appearance of that burning Khandava forest looked as if the whole body of the king of mountains Meru was lit up in the rays of the sun.
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि खाण्डवदाहपर्वणि गाण्डीवादिदाने चतुर्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २२४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत खाण्डवदाहपर्वमें गाण्डीवादिदानविषयक दो सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २२४॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)