वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त: स भगवान् दाशार्हेणार्जुनेन च।
तैजसं रूपमास्थाय दावं दग्धुं प्रचक्रमे॥ ३४॥
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! श्रीकृष्ण और अर्जुन की यह बात सुनकर भगवान अग्नि ने तेजस्वी रूप धारण किया और खाण्डव वन को सब ओर से जलाने लगे॥34॥
Vaishampayanji says – Janamejaya! On hearing this from Shri Krishna and Arjun, Lord Agni took a bright form and started burning the Khandav forest from all sides. 34॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)