श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 224: अग्निदेवका अर्जुन और श्रीकृष्णको दिव्य धनुष, अक्षय तरकस, दिव्य रथ और चक्र आदि प्रदान करना तथा उन दोनोंकी सहायतासे खाण्डववनको जलाना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  1.224.31 
अर्जुन उवाच
चक्रपाणिर्हृषीकेशो विचरन् युधि वीर्यवान्।
चक्रेण भस्मसात् सर्वं विसृष्टेन तु वीर्यवान्।
त्रिषु लोकेषु तन्नास्ति यन्न कुर्याज्जनार्दन:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
अर्जुन बोले - हे अग्निदेव! जब सम्पूर्ण इन्द्रियों को प्रेरित करने वाले ये महाबली जनार्दन हाथ में चक्र लेकर युद्ध में विचरण करेंगे, उस समय तीनों लोकों में ऐसी कोई वस्तु नहीं रहेगी, जो उनके चक्र के प्रहार से नष्ट न हो सके॥31॥
 
Arjun said - O Lord of Fire! When this mighty Janardan, who is the motivator of all the senses, will move about in the battle with his discus in his hand, then at that time there will be nothing in the three worlds that cannot be destroyed by the blow of his discus. ॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)