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mahabharat 1.224.16-17h: रथ के ऊपर बैठा हुआ वानर ऐसा लग रहा था मानो शत्रुओं को खा जाएगा। रथ में और भी कई प्रकार के भयानक जीव थे जिनकी आवाज सुनकर शत्रु सैनिक भयभीत हो जाते थे।   |   mahabharat अध्याय 1.224: अग्निदेवका अर्जुन और श्रीकृष्णको दिव्य धनुष, अक्षय तरकस, दिव्य रथ और चक्र आदि प्रदान करना तथा उन दोनोंकी सहायतासे खाण्डववनको जलाना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 224: अग्निदेवका अर्जुन और श्रीकृष्णको दिव्य धनुष, अक्षय तरकस, दिव्य रथ और चक्र आदि प्रदान करना तथा उन दोनोंकी सहायतासे खाण्डववनको जलाना  »  श्लोक 16-17h
 
 
श्लोक  1.224.16-17h 
दिधक्षन्निव तत्र स्म संस्थितो मूर्ध्न्यशोभत।
ध्वजे भूतानि तत्रासन् विविधानि महान्ति च॥ १६॥
नादेन रिपुसैन्यानां येषां संज्ञा प्रणश्यति।
 
 
अनुवाद
रथ के ऊपर बैठा हुआ वानर ऐसा लग रहा था मानो शत्रुओं को खा जाएगा। रथ में और भी कई प्रकार के भयानक जीव थे जिनकी आवाज सुनकर शत्रु सैनिक भयभीत हो जाते थे।
 
The monkey seated on the top of the chariot looked as if he wanted to devour the enemies. There were many other types of terrifying creatures in the chariot whose voices would frighten the enemy soldiers.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)