श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 224: अग्निदेवका अर्जुन और श्रीकृष्णको दिव्य धनुष, अक्षय तरकस, दिव्य रथ और चक्र आदि प्रदान करना तथा उन दोनोंकी सहायतासे खाण्डववनको जलाना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  1.224.15 
तापनीया सुरुचिरा ध्वजयष्टिरनुत्तमा।
तस्यां तु वानरो दिव्य: सिंहशार्दूलकेतन:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
उस रथ का ध्वजदण्ड अत्यंत सुन्दर और स्वर्णमय था। उस पर सिंह या व्याघ्र के समान भयंकर रूप वाला एक दिव्य वानर विराजमान था।
 
The flagstaff of that chariot was very beautiful and golden. On it sat a divine monkey with a fearsome appearance like that of a lion or a tiger.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)