श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 223: अर्जुनका अग्निकी प्रार्थना स्वीकार करके उनसे दिव्य धनुष एवं रथ आदि माँगना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.223.17 
शरैश्च मेऽर्थो बहुभिरक्षयै: क्षिप्रमस्यत:।
न हि वोढुं रथ: शक्त: शरान् मम यथेप्सितान्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
इसके अतिरिक्त, तीव्र गति से बाण चलाने के लिए मुझे इतने बाणों की आवश्यकता होगी कि वे कभी समाप्त ही न हों। तथा मेरे पास इतना शक्तिशाली रथ भी नहीं है कि मैं इच्छानुसार बाणों को ले जा सकूँ ॥17॥
 
Besides this, in order to continue shooting arrows quickly, I would need so many arrows that they would never end. And I do not have a chariot powerful enough to carry the arrows as per my wish. ॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)