Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 1.222.81: अनेक सिर वाले सर्प भी क्रोध से अचेत हो गए और अग्नि के पास अपने सिरों से जल की धाराएँ तेजी से बरसाने लगे।   |   mahabharat अध्याय 1.222: अग्निदेवका खाण्डववनको जलानेके लिये श्रीकृष्ण और अर्जुनसे सहायताकी याचना करना, अग्निदेव उस वनको क्यों जलाना चाहते थे, इसे बतानेके प्रसंगमें राजा श्वेतकिकी कथा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 222: अग्निदेवका खाण्डववनको जलानेके लिये श्रीकृष्ण और अर्जुनसे सहायताकी याचना करना, अग्निदेव उस वनको क्यों जलाना चाहते थे, इसे बतानेके प्रसंगमें राजा श्वेतकिकी कथा  »  श्लोक 81
 
 
श्लोक  1.222.81 
बहुशीर्षास्ततो नागा: शिरोभिर्जलसंततिम्।
मुमुचु: पावकाभ्याशे सत्वरा: क्रोधमूर्च्छिता:॥ ८१॥
 
 
अनुवाद
अनेक सिर वाले सर्प भी क्रोध से अचेत हो गए और अग्नि के पास अपने सिरों से जल की धाराएँ तेजी से बरसाने लगे।
 
The many-headed serpents also became unconscious with anger and began to rapidly shower streams of water from their heads near the fire. 81.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)