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mahabharat 1.221.10: प्रजा न केवल राजा के पालन करने के राजसी कर्तव्य से संतुष्ट रहती थी, अपितु उसके प्रति आदर और भक्ति के कारण सदैव प्रसन्न भी रहती थी। प्रजा राजा के प्रति समर्पित थी, क्योंकि जो कुछ प्रजा को प्रिय होता था, राजा युधिष्ठिर उसे अपने कर्मों से पूरा करते थे।॥10॥   |   mahabharat अध्याय 1.221: युधिष्ठिरके राज्यकी विशेषता, कृष्ण और अर्जुनका खाण्डववनमें जाना तथा उन दोनोंके पास ब्राह्मणवेशधारी अग्निदेवका आगमन   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 221: युधिष्ठिरके राज्यकी विशेषता, कृष्ण और अर्जुनका खाण्डववनमें जाना तथा उन दोनोंके पास ब्राह्मणवेशधारी अग्निदेवका आगमन  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.221.10 
न तु केवलदैवेन प्रजा भावेन रेमिरे।
यद् बभूव मन:कान्तं कर्मणा स चकार तत्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
प्रजा न केवल राजा के पालन करने के राजसी कर्तव्य से संतुष्ट रहती थी, अपितु उसके प्रति आदर और भक्ति के कारण सदैव प्रसन्न भी रहती थी। प्रजा राजा के प्रति समर्पित थी, क्योंकि जो कुछ प्रजा को प्रिय होता था, राजा युधिष्ठिर उसे अपने कर्मों से पूरा करते थे।॥10॥
 
The subjects were not only satisfied with his royal duties of following the king, they were also always happy because of their respect and devotion towards him. The subjects were devoted to the king because whatever was dear to the subjects, King Yudhishthira fulfilled that through his actions.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)