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mahabharat 1.220.43: किसी को गुरु मानकर उसकी पूजा की, किसी को अपने समवयस्क मित्र मानकर उसका आलिंगन किया, किसी से प्रेमपूर्वक वार्तालाप किया और किसी को प्रणाम किया॥ 43॥   |   mahabharat अध्याय 1.220: द्वारकामें अर्जुन और सुभद्राका विवाह, अर्जुनके इन्द्रप्रस्थ पहुँचनेपर श्रीकृष्ण आदिका दहेज लेकर वहाँ जाना, द्रौपदीके पुत्र एवं अभिमन्युके जन्म, संस्कार और शिक्षा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 220: द्वारकामें अर्जुन और सुभद्राका विवाह, अर्जुनके इन्द्रप्रस्थ पहुँचनेपर श्रीकृष्ण आदिका दहेज लेकर वहाँ जाना, द्रौपदीके पुत्र एवं अभिमन्युके जन्म, संस्कार और शिक्षा  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  1.220.43 
गुरुवत् पूजयामास कांश्चित् कांश्चिद् वयस्यवत्।
कांश्चिदभ्यवदत् प्रेम्णा कैश्चिदप्यभिवादित:॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
किसी को गुरु मानकर उसकी पूजा की, किसी को अपने समवयस्क मित्र मानकर उसका आलिंगन किया, किसी से प्रेमपूर्वक वार्तालाप किया और किसी को प्रणाम किया॥ 43॥
 
Some he worshipped as his Guru, some he embraced as his friends of the same age, some he conversed with lovingly and some he bowed to him.॥ 43॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)