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mahabharat 1.219.30: 'गोविन्द! जैसे साँप पैर की ठोकर सहन नहीं कर सकता, वैसे ही मैं यह कैसे सहन कर सकता हूँ कि उसने मेरे सिर पर पैर रखा है?॥30॥   |   mahabharat अध्याय 1.219: यादवोंकी युद्धके लिये तैयारी और अर्जुनके प्रति बलरामजीके क्रोधपूर्ण उद्‍गार   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 219: यादवोंकी युद्धके लिये तैयारी और अर्जुनके प्रति बलरामजीके क्रोधपूर्ण उद्‍गार  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  1.219.30 
कथं हि शिरसो मध्ये कृतं तेन पदं मम।
मर्षयिष्यामि गोविन्द पादस्पर्शमिवोरग:॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
'गोविन्द! जैसे साँप पैर की ठोकर सहन नहीं कर सकता, वैसे ही मैं यह कैसे सहन कर सकता हूँ कि उसने मेरे सिर पर पैर रखा है?॥30॥
 
'Govind! Just as a snake cannot bear the kick of a foot, how can I bear the fact that he has placed his foot on my head?॥ 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)