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mahabharat 1.218.3: महाराज! उस पर्वत के चारों ओर रत्नजटित अद्भुत राजभवन और कल्पवृक्ष थे, जो उस स्थान की शोभा बढ़ा रहे थे।   |   mahabharat अध्याय 1.218: रैवतक पर्वतके उत्सवमें अर्जुनका सुभद्रापर आसक्त होना और श्रीकृष्ण तथा युधिष्ठिरकी अनुमतिसे उसे हर ले जानेका निश्चय करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 218: रैवतक पर्वतके उत्सवमें अर्जुनका सुभद्रापर आसक्त होना और श्रीकृष्ण तथा युधिष्ठिरकी अनुमतिसे उसे हर ले जानेका निश्चय करना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  1.218.3 
प्रासादै रत्नचित्रैश्च गिरेस्तस्य समन्तत:।
स देश: शोभितो राजन् कल्पवृक्षैश्च सर्वश:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
महाराज! उस पर्वत के चारों ओर रत्नजटित अद्भुत राजभवन और कल्पवृक्ष थे, जो उस स्थान की शोभा बढ़ा रहे थे।
 
King! All around that mountain there were wonderful royal palaces studded with gems and Kalpavrikshas, which were adding to the beauty of that place.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)