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mahabharat 1.218.17: 'कुन्तीनन्दन! वह मेरी और सारण की सगी बहन है। आप धन्य हों। उसका नाम सुभद्रा है। वह मेरे पिता की परमप्रिय पुत्री है। यदि आप उससे विवाह करना चाहते हैं, तो मैं स्वयं पिता से कहूँगा।'॥17॥   |   mahabharat अध्याय 1.218: रैवतक पर्वतके उत्सवमें अर्जुनका सुभद्रापर आसक्त होना और श्रीकृष्ण तथा युधिष्ठिरकी अनुमतिसे उसे हर ले जानेका निश्चय करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 218: रैवतक पर्वतके उत्सवमें अर्जुनका सुभद्रापर आसक्त होना और श्रीकृष्ण तथा युधिष्ठिरकी अनुमतिसे उसे हर ले जानेका निश्चय करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.218.17 
ममैषा भगिनी पार्थ सारणस्य सहोदरा।
सुभद्रा नाम भद्रं ते पितुर्मे दयिता सुता।
यदि ते वर्तते बुद्धिर्वक्ष्यामि पितरं स्वयम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
'कुन्तीनन्दन! वह मेरी और सारण की सगी बहन है। आप धन्य हों। उसका नाम सुभद्रा है। वह मेरे पिता की परमप्रिय पुत्री है। यदि आप उससे विवाह करना चाहते हैं, तो मैं स्वयं पिता से कहूँगा।'॥17॥
 
'Kuntinandan! She is my sister and Saran's real sister, may you be blessed, her name is Subhadra. She is my father's most beloved daughter. If you wish to marry her, I will tell father myself.'॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)