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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 216: वर्गाकी प्रार्थनासे अर्जुनका शेष चारों अप्सराओंको भी शापमुक्त करके मणिपूर जाना और चित्रांगदासे मिलकर गोकर्णतीर्थको प्रस्थान करना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  1.216.7 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त: स धर्मात्मा ब्राह्मण: शुभकर्मकृत्।
प्रसादं कृतवान् वीर रविसोमसमप्रभ:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - हे वीर! ऐसा कहकर उस पुण्यात्मा ब्राह्मण ने, जो सूर्य और चन्द्रमा के समान तेजस्वी और शुभ कर्म करने वाले थे, उन सब पर दया की।
 
Vaishmpayana says - O brave one! Upon his saying so, that virtuous Brahmin, who was as radiant as the Sun and the Moon and who performed auspicious deeds, showed mercy on all of them. 7.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)