Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 1.216.21: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तब उदार हृदय और पराक्रमी पाण्डव अर्जुन ने उन समस्त अप्सराओं को उस शाप से मुक्त कर दिया।   |   mahabharat अध्याय 1.216: वर्गाकी प्रार्थनासे अर्जुनका शेष चारों अप्सराओंको भी शापमुक्त करके मणिपूर जाना और चित्रांगदासे मिलकर गोकर्णतीर्थको प्रस्थान करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 216: वर्गाकी प्रार्थनासे अर्जुनका शेष चारों अप्सराओंको भी शापमुक्त करके मणिपूर जाना और चित्रांगदासे मिलकर गोकर्णतीर्थको प्रस्थान करना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  1.216.21 
वैशम्पायन उवाच
ततस्ता: पाण्डवश्रेष्ठ: सर्वा एव विशाम्पते।
तस्माच्छापाददीनात्मा मोक्षयामास वीर्यवान्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तब उदार हृदय और पराक्रमी पाण्डव अर्जुन ने उन समस्त अप्सराओं को उस शाप से मुक्त कर दिया।
 
Vaishmpayana says - Janamejaya! Then the generous hearted and valiant Pandava Arjuna freed all those Apsaras from that curse.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)